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Thursday, June 24, 2010

स्वामी विवेकानन्द जी

लेकिन दुर्भाग्यवश उस गाँव के रास्ते में ही मुझे तेज़ बुखार आ गया और फिर क़ै - दस्त होने लगी, जैसी हैज़े में होती है। लेकिन दुर्भाग्यवश उस गाँव के रास्ते में ही मुझे तेज़ बुखार आ गया और फिर - क़ै दस्त लगी होने, जैसी हैज़े में होती है. तीन - चार दिन बाद बुखार फिर हो आया -- और इस समय शरीर में इतनी कमज़ोरी है कि मेरे लिए दो क़दम चलना भी कठिन है। - तीन चार दिन बाद बुखार फिर हो आया - और इस समय शरीर में इतनी कमज़ोरी है कि मेरे लिए दो क़दम चलना भी कठिन है. मुझे यह पता नहीं कि ईश्वर की क्या इच्छा है, लेकिन इस मार्ग पर चलने के लिए मेरा शरीर बिल्कुल अक्षम है। मुझे यह पता नहीं कि ईश्वर की क्या इच्छा है, लेकिन इस मार्ग पर चलने के लिए मेरा शरीर बिल्कुल अक्षम है. फिर भी, शरीर ही तो सब कुछ नहीं है। फिर भी, शरीर ही तो सब कुछ नहीं है. ...विश्वेश्वर, जैसा चाहेंगे, चाहे जो हो, वही होगा। ( वि.स. १/३३५, २१ फरवरी, १८८९) ... विश्वेश्वर, जैसा चाहेंगे, चाहे जो हो, वही होगा. (335 1 / वि.स., 21 फरवरी, 1889)

इस समय मैं बहुत बीमार हूँ। इस समय मैं बहुत बीमार हूँ. कभी - कभी बुखार हो जाता है। कभी - कभी बुखार हो जाता है. लेकिन प्लीहा या किसी अन्य अंग में कोई गडबडी नहीं है। लेकिन प्लीहा या किसी अन्य अंग में कोई गडबडी नहीं है. मैं होमियोपैथिक चिकित्सा करा रहा हूँ। (वि.स. १/३३५, २१ मार्च, १८८९, कलकत्ता) मैं होमियोपैथिक चिकित्सा करा रहा हूँ. (335 1 / वि.स., 21 मार्च, 1889, कलकत्ता)

वाराणसी में जब तक रहा, हर समय ज्वर बना रहा, वहाँ इतना मलेरिया है। वाराणसी में जब तक रहा, हर समय ज्वर बना रहा, वहाँ इतना मलेरिया है. गाज़ीपुर में, खासकर जहाँ मैं रहता हूँ, वहाँ की जलवायु स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त लाभदायक है। गाज़ीपुर में, खासकर जहाँ मैं रहता हूँ, वहाँ की जलवायु स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त है लाभदायक.
(वि.स. १/३५२, ३० जनवरी१८९०, गाज़ीपुर) (, वि.स. 1 / 352 30 जनवरी 1890, गाज़ीपुर)

मेरी भी कमर में एक प्रकार का दर्द बना हुआ है, हाल में वह दर्द बहुत बढ गया है एवं कष्ट दे रहा है। मेरी भी कमर में एक प्रकार का दर्द बना हुआ है, हाल में वह दर्द बहुत बढ गया है एवं कष्ट दे रहा है. ...मैं कटिवात से बहुत पीडित रहा हूँ। (वि.स. १/३५६, १३ फरवरी१८९०, गाज़ीपुर) ... मैं कटिवात से बहुत पीडित रहा हूँ. (356 1 / वि.स., 13 फरवरी 1890, गाज़ीपुर)

कमर दर्द ज़रा भी अच्छा नहीं हो रहा है, बहुत कष्ट है। कमर दर्द ज़रा भी अच्छा नहीं हो रहा है, बहुत कष्ट है. ...यहाँ (गाज़ीपुर) ठहरने से मैं मलेरिया से मुक्त हो गया हूँ। ... (यहाँ गाज़ीपुर) ठहरने से मैं मलेरिया से हूँ मुक्त हो गया. केवल कर्मर की पीडा ने मुझे बेचैन कर रखा है। केवल कर्मर की पीडा ने मुझे बेचैन कर रखा है. दर्द दिन - रात बना रहता है और मुझे बहुत बेचैनी रहती है। (वि.स. १/३६४-५, ३ मार्च१८९०, गाज़ीपुर) दर्द - दिन रात बना रहता है और मुझे बहुत बेचैनी रहती है. (वि.स. 1/364-5, 3 मार्च 1890, गाज़ीपुर)

कमर का दर्द भी किसी तरह ठीक नहीं हो पाता -- बडी बला है। कमर का दर्द भी किसी तरह ठीक नहीं हो - पाता बडी बला है. धीरे - धीरे अभ्यस्त होता जा रहा हूँ। (वि.स. १/३७२, २ अप्रैल१८९०, गाज़ीपुर) धीरे - धीरे अभ्यस्त होता जा रहा हूँ. (372 1 / वि.स., 2 अप्रैल 1890, गाज़ीपुर)

मेरा स्वास्थ्य अब काफ़ी अच्छा है; और गाज़ीपुर में रहने से जो लाभ हुआ है आशा है, वह कुछ समय तक अवश्य टिकेगा। (वि.स. १/३७८, ६ जुलाई१८९०, बागबाज़ार) मेरा स्वास्थ्य अब काफ़ी अच्छा, है और गाज़ीपुर में रहने से जो लाभ हुआ है है आशा, वह कुछ समय तक अवश्य टिकेगा. (378 1 / वि.स., 6 जुलाई 1890, बागबाज़ार)

अभी से यहाँ (हैदराबाद) अत्यन्त गर्मी पड रही है, पता नहीं, राजपूताने में और भी कितनी भीषण गर्मी होगी और मैं गर्मी बिल्कुल सहन नहीं कर सकता। अभी से यहाँ (हैदराबाद) अत्यन्त गर्मी पड रही है, पता नहीं, राजपूताने में और भी कितनी भीषण गर्मी होगी और मैं गर्मी बिल्कुल सहन नहीं कर सकता. अतः इसके बाद यहाँ से मुझे बंगलोर जाना पडेगा, तत्पश्चात् उटकमण्ड जाकर मुझे गर्मी बीताना है। अतः इसके बाद यहाँ से मुझे बंगलोर जाना पडेगा, तत्पश्चात् उटकमण्ड जाकर मुझे गर्मी बीताना है. गर्मी में मानो मेरा मस्तिष्क खौल जाता है। गर्मी में मानो मेरा मस्तिष्क खौल जाता है.
(वि.स. १/३८६, २१ फ़रवरी१८९३, हैदराबाद) (, वि.स. 1 / 386 21 फ़रवरी 1893 हैदराबाद)
मैं इतना अधिक थका हुआ हूँ। मैं इतना अधिक थका हुआ हूँ. कि यदि मुझे बिश्राम न मिले तो अगले छः माह तक मैं जीवित रह सकूँगा भी या नहीं, इसमें मुझे सन्देह है।(वि.स. ६/३०३,२५ फ़रवरी १८९७,आलमबाज़ार मठ) कि यदि मुझे बिश्राम न मिले तो अगले छः माह तक मैं जीवित रह सकूँगा भी या नहीं, इसमें मुझे सन्देह है. (303 / 6 वि.स., 25 फ़रवरी 1897 आलमबाज़ार मठ)

हाय मेरा शरीर कितना दुर्बल है, तिस पर बंगाली का शरीर -- इस थोडे परिश्रम से ही प्राणघातक व्याधि ने इसे घेर लिया। हाय मेरा शरीर कितना दुर्बल है, तिस पर बंगाली का शरीर - इस थोडे परिश्रम से ही प्राणघातक व्याधि ने इसे लिया घेर. परन्तु आशा है कि उत्पत्स्यतेsस्ति मम कोठपि समानधर्मा, कालो ह्यायं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी। परन्तु आशा है कि उत्पत्स्यते पृथ्वी s स्ति मम कोठपि समानधर्मा, कालो ह्यायं निरवधिर्विपुला च. (भवभूति) -- अर्थात् मेर समान गुणवाला कोई और है या होगा, क्योंकि काल का अन्त नहीं और पृथ्वी भी विशाल है।(६/३१४,२४ अप्रैल, दार्जिलिंग) (भवभूति) - अर्थात् मेर समान गुणवाला कोई और है या होगा, क्योंकि काल का अन्त नहीं और पृथ्वी भी विशाल है. (/ 314 6, 24 अप्रैल, दार्जिलिंग)

दुर्भाग्यवश इंग्लैण्ड में अत्यन्त परिश्रम से मैं पहले ही थका हुआ था,और दक्षिण भारत की गर्मी में इस अत्यधिक परिश्रम ने मुझे बिल्कुल गिरा दिया।(६/३१५, २८ अप्रैल, दार्जिलिंग) दुर्भाग्यवश इंग्लैण्ड में अत्यन्त परिश्रम से मैं पहले ही थका हुआ था, और दक्षिण भारत की गर्मी में इस अत्यधिक परिश्रम ने मुझे बिल्कुल गिरा दिया. (/ 315 6, 28 अप्रैल, दार्जिलिंग)

मेरे गुच्छे के गुच्छे बाल सफेद हो रहे हैं और मेरे मुख पर चारों ओर से झुर्रियाँ पड रही हैं; शरीर का मांस घटने से बीस वर्ष मेरी आयु बढी हुई मालूम पडती है। मेरे गुच्छे के गुच्छे बाल सफेद हो रहे हैं और मेरे मुख पर चारों ओर से झुर्रियाँ पड रही हैं, शरीर का मांस घटने से बीस वर्ष मेरी आयु बढी हुई मालूम पडती है. और अब मेरा शरीर तेज़ी से घटता चला जा रहा है, क्योंकि मैं केवल मांस पर ही जीवित रहने को विवश हूँ -- न रोटी, न चावल, न आलू और कॉफ़ी के साथ थोडी सी चीनी ही। (६/३१६, २८ अप्रैल, दार्जिलिंग) और अब मेरा शरीर तेज़ी से घटता चला जा रहा है, क्योंकि मैं केवल मांस पर ही जीवित रहने को विवश हूँ - रोटी न, न चावल, न आलू और कॉफ़ी के साथ थोडी सी चीनी ही. (/ 316 6, 28 अप्रैल, दार्जिलिंग)

मैं अपने बिगडे हुए स्वास्थ्य को सँभालने एक मास के लिए दार्जिलिंग गया था। मैं अपने बिगडे हुए स्वास्थ्य को सँभालने एक मास के लिए दार्जिलिंग गया था. मैं अब पहले से बहुत अच्छा हूँ। मैं अब पहले से बहुत अच्छा हूँ. दार्जिलिंग में मेरा रोग पूरी तरह से भाग गया। (६/३१७, ५ मई, १८९७,आलमबाज़ार मठ) दार्जिलिंग में मेरा रोग पूरी तरह से भाग गया. (/ 317 6, 5 मई, 1897, आलमबाज़ार मठ)

स्वास्थ्य सुधारने के लिए मुझे एक माह तक दार्जिलिंग रहना पडा। स्वास्थ्य सुधारने के लिए मुझे एक माह तक दार्जिलिंग रहना पडा. तुम्हें यह जानकर खुशी होगी कि मैं पहले की अपेक्षा बहुत कुछ स्वस्थ हूँ। तुम्हें यह जानकर खुशी होगी कि मैं पहले की अपेक्षा बहुत कुछ स्वस्थ हूँ. और, क्या तुम्हें विश्वास होगा, बिना किसी प्रकार की औषधि सेवन किये केवल इच्छा - शक्ति के प्रयोग द्वारा ही? (६/३२०,५ मई, १८९७,आलमबाज़ार मठ) और, क्या तुम्हें विश्वास होगा, बिना किसी प्रकार की औषधि सेवन किये केवल इच्छा - शक्ति के प्रयोग द्वारा ही? 6 / (320 5 मई, 1897, आलमबाज़ार मठ)

अल्मोडा में अत्यधिक गर्मी होने की वजह से वहाँ से २० मील की दूरी पर मैं एक सुन्दर बगीचे में रह रहा हूँ... अल्मोडा में अत्यधिक गर्मी होने की वजह से वहाँ से 20 मील की दूरी पर मैं एक सुन्दर बगीचे में रह रहा हूँ ... मुझे अब बुखार नहीं आता। मुझे अब बुखार नहीं आता. और भी ठन्डे स्थान में जाने की चेष्टा कर रहा हूँ। और भी ठन्डे स्थान में जाने की चेष्टा कर रहा हूँ. मैं अनुभव करता हूँ कि गर्मी तथा चलने के श्रम से 'लीवर' की क्रिया में तुरन्त गडबडी होने लगती है। मैं अनुभव करता हूँ कि गर्मी तथा चलने के से श्रम 'लीवर की क्रिया में तुरन्त गडबडी होने लगती है. यहाँ पर इतनी सूखी हवा चलती है कि दिन - रात नाक में जलन होती रहती है और जीभ भी लकडी जैसी सूखी बनी रहती है। (६/३२२, २० मई१८९७ अल्मोडा) यहाँ पर इतनी सूखी हवा चलती है कि - दिन रात नाक में जलन होती रहती है और जीभ भी लकडी जैसी सूखी बनी रहती है. (/ 322 6, 20 मई 1897 अल्मोडा)

सुबह - शाम घोडे पर सवार होकर मैंने पर्याप्त रूप से व्यायाम करना प्रारम्भ कर दिया है और उसके बाद से सचमुच मैं बहुत अच्छा हूँ। - सुबह शाम घोडे पर सवार होकर मैंने पर्याप्त रूप से व्यायाम करना प्रारम्भ कर दिया है और उसके बाद से सचमुच मैं बहुत अच्छा हूँ. व्यायाम शुरू करने के बाद पहले सप्ताह में ही मैं इतना स्वस्थ अनुभव करने लगा, जितना कि बचपन के उन दिनों को छोडकर जब मैं कुश्ती लडा करता था, मैंने कभीनहीं किया था। व्यायाम शुरू करने के बाद पहले सप्ताह में ही मैं इतना स्वस्थ अनुभव करने लगा, जितना कि बचपन के उन दिनों को छोडकर जब मैं कुश्ती लडा था करता, मैंने कभीनहीं किया था. तब मुझे सच में लगता था कि शरिरधारी होना ही एक आनन्द का विषय है। तब मुझे सच में लगता था कि शरिरधारी होना ही एक आनन्द का विषय है. तब शरीर की प्रत्येक गति में मुझे शक्ति का आभास मिलता था तथा अंग - प्रत्यंग के संचालन से सुख की अनुभूति होती थी। तब शरीर की प्रत्येक गति में मुझे शक्ति का आभास मिलता था तथा - अंग प्रत्यंग के संचालन से सुख की अनुभूति होती थी. वह अनुभव अब कुछ घट चुका है, फिर भी मैं अपने को शक्तिशाली अनुभव करता हूँ।... वह अनुभव अब कुछ घट चुका है, फिर भी मैं अपने को शक्तिशाली अनुभव करता हूँ .... एक उल्लेखनीय परिवर्तन दिखायी दे रहा है। एक उल्लेखनीय परिवर्तन दिखायी दे रहा है. बिस्तरे पर लेटने के साथ ही मुझे कभी नींद नहीं आती थी -- घंटे दो घंटे तक मुझे इधर - उधर करवट बदलनी पडती थी। बिस्तरे पर लेटने के साथ ही मुझे कभी नींद नहीं आती - थी घंटे दो घंटे तक मुझे इधर - उधर करवट बदलनी पडती थी. केवल मद्रास से दार्जिलिंग तक (दार्जिलिंग में सिर्फ़ पहले महीने तक) तकिये पर सिर रखते ही मुझे नींद आ जाती थी। केवल मद्रास से दार्जिलिंग (तक दार्जिलिंग में सिर्फ़ पहले महीने तक) तकिये पर सिर रखते ही मुझे नींद आ थी जाती. वह सुलभनिद्रा अब एकदम अन्तर्हित हो चुकी है और इधर - उधर करवट बदलने की मेरी वह पुरानी आदत तथा रात्रि में भोजन के बाद गर्मी लगने की अनुभूति पुनः वापस लौट आयी है। वह सुलभनिद्रा अब एकदम अन्तर्हित हो चुकी है और इधर - उधर करवट बदलने की मेरी वह पुरानी आदत तथा रात्रि में भोजन के बाद गर्मी लगने की अनुभूति पुनः वापस लौट आयी है. दिन में भोजन के बाद कोई खास गर्मी का अनुभव नहीं होता।... दिन में भोजन के बाद कोई खास गर्मी का अनुभव नहीं होता .... साधारणतया यहाँ पर मुझे शक्तिवर्ध्दन के साथ ही साथ प्रफुल्लता तथा विपुल स्वास्थ्य का अनुभव हो रहा है। साधारणतया यहाँ पर मुझे शक्तिवर्ध्दन के साथ ही साथ प्रफुल्लता तथा विपुल स्वास्थ्य का अनुभव हो रहा है. चिन्ता की बात केवल इतनी है कि अधिक मात्रा में दूध लेने के कारण चर्बी की वृध्दि हो रही है।... चिन्ता की बात केवल इतनी है कि अधिक मात्रा में दूध लेने के कारण चर्बी की वृध्दि हो रही है .... हाँ, एक बात और है, मैं आसानी से मलेरियाग्रस्त हो जाता हूँ... हाँ, एक बात और है, मैं आसानी से मलेरियाग्रस्त हो जाता हूँ ... खैर, इस समय तो मैं अपने को अत्यन्त बलशाली अनुभव कर रहा हूँ। खैर, हूँ इस समय तो मैं अपने को अत्यन्त बलशाली अनुभव कर रहा. डॉक्टर, आजकल जब मैं बर्फ़ से ढके हुए पर्वतशिखरों के सम्मुख बैठकर उपनिषद् के इस अंश का पाठ करता हूँ -- न तस्य रोगो न जरा न मृत्यु प्राप्त्स्य योगाग्निमयं शरीरम् (जिसने योगाग्निमय शरीर प्राप्त किया है, उसके लिए जरा-मृत्यु कुछ भी नहीं है) उस समय यदि एक बार तुम मुझे देख सकते! (६/३२४,२९मई,१८९७,अल्मोडा) डॉक्टर, आजकल जब मैं बर्फ़ से ढके हुए पर्वतशिखरों के सम्मुख बैठकर उपनिषद् के इस अंश का पाठ करता हूँ - न तस्य रोगो न जरा न मृत्यु प्राप्त्स्य योगाग्निमयं (शरीरम् जिसने योगाग्निमय शरीर प्राप्त किया है, उसके लिए जरा - है मृत्यु कुछ भी नहीं ) उस समय यदि एक बार तुम मुझे देख सकते! (/ 324 6, 29 मई, 1897, अल्मोडा)
शुध्द हवा, नियमानुसार भोजन और यथेष्ट व्यायाम करने से मेरा शरीर बलवान तथा स्वस्थ हो गया है। (६/३३०,अल्मोडा) शुध्द हवा, नियमानुसार भोजन और यथेष्ट व्यायाम करने से मेरा शरीर बलवान तथा स्वस्थ हो गया है अल्मोडा. (6/330)

मैं अब पूर्ण स्वस्थ हूँ। मैं अब पूर्ण स्वस्थ हूँ. शरीर में ताक़त भी खूब है; प्यास नहीं लगती तथा रात में पेशाब के लिए उठना भी नहीं पडता।... शरीर में ताक़त भी खूब; है प्यास नहीं लगती तथा रात में पेशाब के लिए उठना भी नहीं पडता .... कमर में कोई दर्द - वर्द नहीं है; लीवर की क्रिया भी ठीक है।... कमर में कोई - दर्द वर्द नहीं है; लीवर की क्रिया भी ठीक है .... पर्याप्त मात्रा में आम खा रहा हूँ। पर्याप्त मात्रा में आम खा रहा हूँ. घोडे की सवारी का अभ्यास भी विशेष रूप से चालू है -- लगातार बीस - तीस मील तक दौडने पर भी किसी प्रकार के दर्द अथवा थकावट का अनुभव नहीं होता। घोडे की सवारी का अभ्यास भी विशेष रूप से चालू - है लगातार - बीस तीस मील तक दौडने पर भी किसी प्रकार के दर्द अथवा थकावट का अनुभव नहीं होता. पेट बढने की आशंका से दूध लेना क़तई बन्द है। (६/३३७,२०जून,१८९७, अल्मोडा) पेट बढने की आशंका से दूध लेना क़तई बन्द है. (/ 337 6, 20 जून, 1897, अल्मोडा)

Thursday, December 3, 2009


स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, " भारतवर्ष में एक सुंदर किंवदन्ती प्रचलित है। वह यह कि आकाश में स्वाति नक्षत्र के तुन्गस्थ रहते यदि पानी गिरे और उसकी एक बूंद किसी सीपी में चली जाय, तो उसका मोती बन जाता है।

सीपियों को यह मालूम है। अतएव जब वह नक्षत्र उदित होता है, तो वे सीपियाँ पानी की ऊपरी सतह पर आ जाती हैं, और उस समय की एक अनमोल बूंद की प्रतीक्षा करती रहती है। ज्यों ही एक बूंद पानी उनके पेट में जाता है, त्यों ही उस जलकण को लेकर मुंह बन्द करके वे समुद्र के अथाह गर्भ में चली जाती हैं और वहाँ बड़े धैर्य के साथ उनसे मोती तैयार करने के प्रयत्न में लग जाती हैं।

हमें भी उन्हीं सीपियों की तरह होना होगा। पहले सुनना होगा, फ़िर समझना होगा, अन्त में बाहरी संसार से दृष्टि हटाकर, सब प्रकार की विक्षेपकारी बातों से दूर रहकर हमें अन्तर्निहित सत्य-तत्त्व के विकास के लिए प्रयत्न करना होगा। एक भाव को पकडो, उसी को लेकर रहो। उसका अन्त देखे बिना उसे मत छोड़ो। जो एक भाव को लेकर उसी में मत्त रहते हैं, उन्हीं के ह्रदय में सत्य तत्त्व का उन्मेष होता है।

...एक विचारलो उसी विचार को अपना जीवन बनाओ उसी का चिंतन करो, उसी का स्वप्न देखो और उसी में जीवन बिताओ।सब प्रकार की बकवास छोड़ दो। जिन्होंने प्रत्यक्ष अनुभव किया है, केवल उन्हीं के लिखे ग्रन्थ पढो।

यदि हम सचमुच स्वयं कृतार्थ होना और दूसरों का उद्धार करना चाहें, तो हमे मन की गहराई तक जाना पड़ेगा। पुरी लगन के साथ, कमर कसकर साधना में लग जाओ- फ़िर मृत्यु भी आये, तो क्या ! मन्त्रं वा साधयामि शरीरं वा पातयामि - काम सधे या प्राण ही जायें। फल की ओर आँख रखे बिना साधना में मग्न होजाओ ! " (१:८९-९०)



" जब मनुष्य अपने मन का विश्लेषण करते करते ऐसी एक वस्तु के साक्षात् दर्शन कर लेता है, जिसका किसी काल में नाश नहीं, जो स्वरूपतः नित्यापूर्ण और नित्यशुद्ध है, तब उसको फ़िर दुःख नहीं रह जाता, उसका सारा विषाद न जाने कहाँ गायब हो जाता है।

भय और अपूर्ण वासना ही समस्त दुखों का मूल है।

पूर्वोक्त अवस्था के प्राप्त होने पर मनुष्य समझ जाता है कि उसकी मृत्यु किसी काल में नहीं है, तब उसे फ़िर मृत्यु-भय नहीं रह जाता। अपने को पूर्ण समझ सकने पर असार वासनाएं फ़िर नहीं रहतीं।

पूर्वोक्त कारणद्वय का आभाव हो जाने पर फ़िर कोई दुःख नहीं रह जाता। उसकी जगह इसी देह में परमानन्द की प्राप्ति हो जाती
मनः संयोग -१५ : परीक्षा और परिणाम '


हम यह कैसे जानेंगे कि मन की दृष्टि धारणा की वस्तु या लक्ष्य पर पड़ रही है या नहीं ? इसकी पहचान यही है कि मन जब किसी वस्तु पर पुर्णतः एकाग्र रहता है तो-

उस समय मन में अन्य कोई विचार उठेगा ही नहीं। पहले से चयनित आदर्श या लक्ष्य ही मन के चिन्तन का एक मात्र विषय बन जाएगा। उस मूर्त आदर्श में जो उच्चभाव हैं बस उन्हीं का चिन्तन चलता रहेगा।



धीरे धीरे लक्ष्य के ऊपर कितने दीर्घ अवधि तक मनः संयोग या धारणा की गई, यह भी ज्ञात नहीं रह जाएगा।प्रतिदिन नियमित रूप से

- " मन को एक ही आदर्श में एकाग्र करने कि चेष्टा को मनः संयोग कहा जाता है।"



प्रति दिन इस अभ्यास को करने से - मन को अपनी इच्छा और प्रयोजनीयता के अनुसार किसी भी ज्ञातव्य विषयपर एकाग्र करने की क्षमता प्राप्त हो जाती है।

" इच्छा मात्र से

हम अपने मन को-- किसी भी इन्द्रिय विषयों से खींच कर, किसी भी ' ज्ञातव्य ' विषय में लगा सकते हैं। धारणा के अभ्यास को ही मन का व्यायाम भी कहा जाता है।" शारीरिक व्यायाम एवं पौष्टिक आहार से जिस प्रकार शरीर की शक्तियों में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती है, उसी प्रकार

मानसिक व्यायाम तथा मानसिक आहार से मन की शक्ति भी बलवती होती जाती है।



शुभ विचारों का चिन्तन करने से मन को भी पौष्टिक आहार मिल जाता है। श्रेष्ठ साहित्य, अच्छी संगत, रचनात्मक विचार-विमर्श, उच्च भावों का चिन्तन जैसा पौष्टिक आहार और धारणा या मनः संयोग के नियमित व्यायाम के द्वारा मन को उन्नत और शक्तिशाली बनाया जा सकता है।

इस शक्तिशाली मन को संयत करके वशीभूत कर लिया जाय तो उसको किसी भी कार्य में नियोजित कर उस कार्यमें पूर्ण सफलता पाई जा सकती है। जिस व्यक्ति ने मन की गुलामी करनी छोड़ दी और ख़ुद उसका स्वामी बन गया, अर्थात जिसने अपने मन को जीत लिया है, उसने वस्तुतः जगत को भी जीत लिया है।

वह कहींभी और किसी भी काम में पराजित नहीं होता, क्योंकि वह मन की अनन्त शक्ति का अधिकारी बन जाता है। वह जिस किसी विषय में अपना मनोनिवेश करगा, वह विषय उसे पुरी तरह याद हो जाएगा। वशीभूत मन की सहायता से हम अपना जीवन सुंदर ढंग से गठित करने में सफल हो जाते हैं, तथा जीवन लक्ष्य को

प्राप्त करने के उपायों पर मनः संयोग करके अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं। इस प्रकार हम लोग धारणा या मनः संयोग का अभ्यास करके इसी जीवन में यथार्थ सुख, शान्ति और आनन्द के अधिकारी बन सकते है।